रात के 2:17 बजे आरव के फोन पर उसके ही नंबर से कॉल आई। उसने फोन उठाया। दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ सांसों की आवाज आती रही। फिर एक धीमी आवाज आई— “आरव… दरवाजा मत खोलना।” आरव घबरा गया। “कौन बोल रहा है?” आवाज फिर आई— “मैं… तुम ही हूं।” तभी उसके कमरे के बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया। ठक… ठक… ठक… आरव ने फोन की स्क्रीन देखी। कॉल अभी भी उसी के नंबर से चल रही थी। बाहर से आवाज आई— “आरव, दरवाजा खोलो… मैं हूं।” फोन पर मौजूद आवाज फुसफुसाई— “जो बाहर है… वो मैं नहीं हूं।” आरव पीछे हट गया। अचानक कमरे की लाइट बंद हो गई। कुछ सेकंड बाद फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी। उस पर एक नया मैसेज था— “तुमने दरवाजा खोल दिया था… 7 मिनट पहले।” आरव ने कांपते हुए दरवाजे की तरफ देखा। दरवाजा खुला हुआ था। और कमरे के अंदर फर्श पर गीले पैरों के निशान थे… जो बाहर से अंदर नहीं, अंदर से बाहर जा रहे थे।